हम‌लोग तो शिव नगरी के हैं.. न जाने कब इ कि मात्रा हटी शव हो गये ! फिर तो सच में राम मिलेंगे ! #Story #Currentissue #People #Part-2

शाम का वक्त:सूरज लाल हो चुका था, आज कल जैसे टमाटर बिकते हैं वैसे ही; शायद आज के जमाने का सूरज है इसलिए । कपूर साब और अब्दुल चाचा अस्सी घाट पर नाव पर बैठे पानी के हल्की लहरों का आनन्द ले रहे थे!

चाचा को अस्सी बिल्कुल पसंद नहीं वो कहते-‘पान घुलाये हुए’ अमा यार ये अस्सी पर शाम होते ही लड़के और लड़कियों के मजमे लग जाते हैं । कोई झगड़ता है तो कोई लिपटे हुए बैठा है… तो क‌ई ऐसे है जैसे किसी के तलाश में आये है.. कपूर हल्की मुस्कान लिए बोले इसमें आप काहे सूरज की तरह मुंह लाल किये हुए हैं !

कपूर साब समझ चुके थे जज़्बाती अब्दुल अपने दौर में पहुंच चुके हैं…! कपूर साब पेशे से वकील और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रेमी …! उनकी पैरवी करते हुए अरे ये एक्किसवी शदी है सबको अपने इच्छानुसार जीवन बिताने का अधिकार है।

चचा कहां समझने वाले तुरन्त तनतना कर बोले कैसी आज़ादी मियां ? जो विदेशियों से हम लोगों को‌ मिली या जो विदेशियों को अपने देश में मिली है।

कपूर साब अब्दुल चाचा के चेहरे पर कुछ देर नजर गड़ाए.. सोचते रहे आज अब्दुल इतना गंभीर क्यो है… और ऐसी बात रख दी जो सोचने पर मजबूर कर दे । तभी चचा ने दुसरी बात रख दी आपके पिताजी ने भी अंग्रेजी सत्ता से कितना संघर्ष लिया । इस ऐसे हिन्दुस्तान के लिए… जहां बुरे कामों की आजादी और अच्छे काम वालों की खतरेजान हो जाए …

कपूर साब असल समस्या जानना चाहते थे उन्होंने ने प्रेम से पुछा आज कुछ दिक्कत में आप लग रहे हैं साहब वरन् कहा की बात कहा ले जा रहे हैं…

वार्तालाप जारी ही थी पिताजी आ गये.. कपूर साब ने कहा आज अब्दुल साहब बहुत उखडे-उखडे़ समझ आ रहें हैं… पिताजी ने गम्भीरता से कपूर साब हाथ उठाकर ठहरने का इशारा करते हुए शांत रहने को कहा । कुछ देर मौन रहने के बाद चचा ने कहा गलती हमारी ही है ; हमें क्या ज़रूरत आज कल के आवारा लड़कों ज्ञान बांटते चले । कपूर साब ने फिर प्रश्न किया आखिर बात क्या ? पिताजी ने कोई जवाब न देते हुए कहा… इन लड़कों को सही रास्ता दिखाना तो हम लोगों का कर्त्तव्य बनता है.. कभी कभी कुछ बिगड़ैल भी मिल जाते हैं… और कभी-कभी ऐसे भटके लोग जो दाढ़ी और टोपी का अपमान करके गर्व की झुठी सांत्वना प्राप्त करते हैं ….धर्म और संस्कृतियां हमे जीने का ढंग ही तो सिखाती है आखिर हम भी तो तुम्हारे अपने है कभी भी तुम्हें अपने से अलग होने का अहसास होने दिया… अरे कौन समझाए इन अक्ल के अंधो को जब दो संस्कृतियों का प्रेम पुर्वक वाद होता है तभी तो शिव की छवि राम के गुण और कुरान की बातें याद आती है। ऐसे कौन याद करता है मर्यादा पुरुषोत्तम राम को.. ई लोग को केवल अन्नपूर्णा मंदिर में हाथ जोड़े टिका लगाये चलै आये। राम के गुण कब लायेंगे? अरे हम‌लोग तो शिव नगरी के हैं.. न जाने कब इ कि मात्रा हटी शव हो गये ! फिर तो सच में राम मिलेंगे ! उस गम्भीरता को , गम्भीरता से हास्य का रूप देने में पिताजी काफी हद तक सफल हुए … लेकिन कपूर साब अब तक सारी कहानी समझ चुके थे! इनका पारा चढ़ चुका था …!एक ही सांस में सवाल किया कौन था वो (भो….) । मेरे मुख से तुरन्त वाणी आयी.. मुनमुन .. दुसरा सवाल ई मुनमुन कौन आ गया बे..! मेरा जवाब बच्चा सेठ का बेटा। कपूर साब बोले अच्छा… ऊ!

बिना धोती झाड़े उठे और चल दिए….

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कपड़े में झोले फिट कर देना चाहिए…. पर्यावरण के लिए बेहतर होगा! #व्यंग्य #सामाजिक #fashion #Story #Part-1

पुरानी परंपरा के अब्दुल चाचा, मुंह में हमेशा पान दबाये अपने बचपन और जवानी के किस्से सुनाते नहीं थकते। बचपन से ही वह कितने होशियार थे इसका ढिंढोरा पीटना उनका शौक था तो नई पीढ़ी को कोसना उनकी आदत जैसे – गली मोहल्ले के लड़के अगर कटे-फटे जींस पहनकर चलते दिख जाते तो चाचा उन्हें चक्ती (अलग से कपड़े का टुकड़ा) लगाने की सलाह दे देते। झुंझलाकर बच्चे फैशन के दौर की समझदारी वाला जवाब दे ही देते कि यह तो आजकल का फैशन है चचा, लेकिन चाचा का मानना था कि अगर फैशन के दौर में कुछ भी कर सकते हैं तो कपड़े में झोले फिट कर देना चाहिए मियां सामान लाने और ले जाने में सहुलियत तो होती ही, पर्यावरण की बेहतरी के काम भी आता

शायद अपनी इसी होशियारी के दंभ में वह गर्वीले और झबरीले कुत्तों के मालिकों को बकरी-गाय पालने की सलाह देते दिख जाते- अरे भाई थोड़ा बहुत सानी भूसे खाती है या फिर घर का बचा-कुचा खाना खाकर भी क‌ई लोटे दुध दे देवेगीं , बाजार के मिलावटी दुध से तुलना कर अपनी बात में वजन ला देते थे , मालिकों की चोंचले तब उड़ जाते जब मुर्गी कुत्ते से बेहतर साबित हो जाती, आखिर अंडे जो देती है।

अब्दुल चाचा को क्या पता रौब भी तो कोई चीज होती है,खैर रखवाली तो शासन भी नहीं कर पा रही। नुकसान-फायदे के बारे में सोचने की क्षमता किसमें है! आज हर चीज दिखावे के लिए तो हो रही है। अब तो यह कहावत भी हर जुबान पर है जो दिखता है वही बिकता है तो चचा को कौन समझाए वाकई में आप बहुत समझदार है

To be Continue…

Some Reason to Failure of Ghatbandhan in Uttar Pradesh (Hindi हिन्दी) #political

राज्य’उत्तर प्रदेश’ यहां जातिगत रास्तों और धार्मिक ध्रूवीकरण की सीढ़ियों को चढ़े बिना राजनीतिक सत्ता पाना आसान नहीं।

प्रदेश में गठबंधन की विफलता यहां एक नया राजनीतिक सरोकार पैदा करेगी। गठबंधन की सीटों का अगर मूल्यांकन किया जाए तो 2014 में 47 सीटें ऐसी थीं, जिस पर समाजवादी पार्टी व बसपा के वोट मिलकर किसी भी अन्य दल से अधिक मत प्राप्त करते थे लेकिन 2019 के चुनाव में वह मत उन्हें पुनः प्राप्त नहीं हुए!

ये दोनों पार्टियां आखिर क्यों अपने वोटों को उसी अनुपात में समेटने में विफल रहीं?

राजनीतिक विश्लेषक मानते है कि यह मोदी लहर (wave) ही है, जिसमें सभी जातिगत दीवारें ढह गयी लेकिन इस ओर ध्यान देने की जरूरत है कि यह लहर उत्तर प्रदेश में पैदा करने का श्रेय भी इस गठबंधन को ही जाता है जोकि पिछड़ों, अति पिछड़ों एवं जनजातियों की राजनीति करते हैं। गठबंधन के नेताओं ने इनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया । ऐसे बहुत से अवसर मिले जब उन्हें पिछड़ी जातियों एवं जनजातियों के पक्ष में आवाज उठाने की कोशिश अवश्य करनी चाहिए थी।

हम देख सकते हैं जब मोदी सरकार ने उच्च जातियों को 10% आरक्षण की व्यवस्था की।इस समय पिछड़ों की राजनीति करने वाले यह दल चुप रहें । यह गठबंधन के दोनों नेताओं के लिए अपनी खोई जमीन वापस पाने का सुनहरा अवसर था। इस समय गठबंधन को सबसे मुखर विरोध करने की आवश्यकता थी ! यहा विरोध का तात्पर्य यह है कि जब 15% सवर्ण जातियां 10% आरक्षण योग्य है तो 65% पिछड़ी जातियों को केवल 27% आरक्षण देना कहां से उचित है! क्या इसे बढ़ाये जाने और जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण न देना गठबंधन के लिए बड़ा मुद्दा नहीं था! सरकार के लिए यह सवाल गले की फांस बन जाती कि जब सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रतिशत 50% की बाध्यता के बावजूद अतिरिक्त 10% आरक्षण सामान्य वर्ग को दे सकती है तो ऐसा कदम उन्होंने पिछड़ा वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए जनसंख्या के अनुपात में क्यों नही किया।सवाल यह है गठबंधन ने यह मुद्दे क्यों नहीं उठाए!

सरकार के इस दावे का भी जवाब दिया जाना था कि सरकार ने 50 प्रतिशत की सामान्य वर्ग के लोगों के लिए है उसी में से 10% गरीब सामान्य वर्ग के लिए नियत किया है। इस तर्क में भी बिल्कुल दम न था क्योंकि 50% अनारक्षित पदों पर सामान्य वर्ग पिछड़ा वर्ग और जनजातियों सभी के लिए उपलब्ध है यदि ऐसा ना होता तो यह सीधे तौर पर सवर्ण जातियों के लिए 50% का आरक्षण होता!यहां भी गठबंधन ने इन मुद्दों को पिछड़ा वर्ग तक ले जाने की कोई भी कोशिश नहीं की और ना ही इन जातियों में ऐसा प्रचार किया जिससे इन जातियों में जागरूकता उत्पन्न हो और सपा व बसपा की ओर आकर्षण बढ़े! इस समय उन्हें शायद सवर्ण मतदाताओं के नाराज़ हो जाने की चिंता थी जबकि एक नया जातिगत समीकरण दृष्टि-गोचर है कि सवर्ण वर्ग के अधिकांश मतदाता भाजपा की ओर बहुत समय पहले से ही स्थाई हो चुके हैं। इसे हम अभी तक इसलिए नहीं समझ सकें क्योंकि इनका जातिगत ध्रुवीकरण राष्ट्रवाद शब्द के भीतर दब जाता है, यह अपने जातिगत ध्रुवीकरण को राष्ट्रवाद का चादर में लपेट कर सामने आने‌ ही नही देते, और इसमें वह सफल भी हुए हैं जबकि अन्य जातियां जातिवादी राजनीति करते हुए प्रतीत होती है ऐसा पेश किया जाता है। इसका भी जवाब देने की आवश्यकता इन्हीं दलों से अपेक्षित थी।

समाजवाद की विचारधारा से जुड़े नेताओं ने मुख्यत: अखिलेश यादव ने मोदी के पूंजीवादी जुड़ाव के मुद्दे पर भी मुखर रूप से प्रश्न नहीं किया जबकि राहुल गांधी यह बार-बार मुद्दा उठाते रहे कि सरकार कुछ गिने-चुने पूंजी-पतियों के के लिए कार्य कर रही है! इस लिए मिडिया ने राहुल गांधी को कवरेज में रखे रहा ।

अंततः समाजवादी और बहुजन समाजवादी पार्टी की भविष्य की राजनीति खतरे में दिखाई देती प्रतीत होती है सभी जानकारों द्वारा कहा जा रहा है ऐसा इसलिए भी है कि लोगों के भीतर समाजवाद के प्रति राजनीति जागरूकता की कमी है बहुत से लोगआपको मिल जाएंगे जो यह नहीं जानते कि समाजवाद क्या है और समाजवाद का मुख्य उद्देश्य क्या है। समाजवाद की विचारधारा से राज्य व देश के लिए किसी प्रकार उपयोगी है जनता को इसका भी ज्ञान नहीं है इन सभी चीजों का प्रचार इन्हीं दलों को करना था जिस पर इन्होंने तनिक भी ध्यान नहीं दिया और इस विचारधारा का लोगों से खासकर उत्तर प्रदेश के लोगों से लोप गया। यह छोटी बात नहीं है और इसे इन दलों द्वारा नजरअंदाज भी नहीं करना क्योंकि राजनीतिक लड़ाई में विचारधारा बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रखती है और समाजवादी विचारधारा की महत्ता को दर्शाने के लिए हम कह सकते हैं कि भारतीय संविधान उद्देशिका ( Preamble) में समाजवादी को अधिनियमित किया गया है इसे समझने की आवश्यकता है कि ऐसा क्यों किया गया!

In India Development Defeated By Hindutva and Caste #Political #election

In India’s Development is not a main political issues because we saw that Rahul Gandhi trying to Grow Development issue and modi trying to divide people to Hindu-Muslim and Nationalist -antinationalist in this election. People of India vote for a face not For his cabinet purformance. We Also saw In Ghazipur Manoj Sinha did good work in Ghazipur but here development defeated by Caste and Hindutva. Sinha Defeated by own Party because when in Uttar Pradesh BJP Made Government People wanted to Sinha act as Cheif Minister but BJP wants to Develop Hindutva so they prefer Aditya Nath.They Did not respect his own development face We can see many non porforming Member of Parliament won this election. A good cabinet can do better in many fields not a face its goodness of democracy and dividing own citizens mind or thinking its very bad for development. At the end Hindutva is not a long run issue it abolished by Roti kapdha and makan. Bjp proved that by emerging Nationalism issues. For future think what will be the issues?

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